1954 में मैला आंचल
के प्रकाशन को हिन्दी उपन्यास की अद्भुत घटना के रूप में माना जाता है। इसने
आंचलिक उपन्यास के रूप में न सिर्फ हिन्दी उपन्यास की एक नयी धारा को जन्म दिया, बल्कि आलोचकों को
लम्बे समय तक इस पर वाद-विवाद का मौका भी दिया। अंग्रेजी में चौसर के ‘केन्टरवरी टेल्स’ और अमेरिकी
साहित्य में शेरवुड एंडरसन के ‘बाइंसबर्ग ओहियो’ की तरह रेणु मैला आंचल के साथ हिन्दी में
आंचलिकता के ताजे झोंके को लेकर आते हैं। गांव की मिट्टी की सोंधी महक, गांव के गीत, नृत्य और संगीत
की मधुर धुन, विदापन और सारंगा सदाबृज की तान हिन्दी उपन्यास के लिए बिल्कुल नयी चीज थे। इस
नयेपन ने बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
उपन्यास की भूमिका में ही रेणु ने इसे आंचलिक
उपन्यास की संज्ञा दी है- ‘‘यह है मैला आंचल, एक आंचलिक उपन्यास। कथानक है पूर्णिया। इसमें
शूल भी हैं फूल भी, कीचड़ भी है चन्दन भी। मैं किसी से नजर बचाकर निकल नहीं पाया
हूं।’’ आंचलिकता शब्द को
लेकर आलोचकों ने आलोचना और प्रशंसा दोनों की झड़ी लगा दी। कुछ आलोचकों ने तुरन्त ही
न सिर्फ आंचलिक उपन्यास नामक एक नयी विधा का प्रवर्तन कर दिया बल्कि समानता के
आधार पर कई पूर्ववर्ती उपन्यासों को भी आंचलिक उपन्यास के खांचे में फिट कर दिया।
दूसरी ओर कुछ आलोचकों ने एक शिल्प के रूप में आंचलिकता को खारिज करते हुए इसे
अयथार्थवादी तथा रेणु को रूपवादी घोषित कर दिया। वस्तुतः यह दोनों ही विचार
अतिवादी हैं। जिस तरह रेणु पर रूपवादी और अयाथार्थवादी होने का आरोप उचित नहीं
प्रतीत होता उसी प्रकार बलचनमा, गंगामैया, सतीमैया का चौरा जैसे उपन्यासों को आंचलिक उपन्यासों की
श्रेणी में रखना गलत है। वस्तुतः आंचलिक उपन्यास के जिन प्रवृत्तियों की बात आलोचक
करते है उन्हें सामने रखकर देखे तो यह कहना पड़ेगा कि ‘एक विधा के रूप में आंचलिक उपन्यास रेणु के साथ
प्रारम्भ होकर उन्हीं के साथ समाप्त हो जाते हैं’।
रेणु पर बांग्ला साहित्य का पर्याप्त प्रभाव
था। कुछ विद्वान मैला आंचल को सती नाथ भादुड़ी के ‘दोडाय चरित मानस’ की अनुकृति मानते है, परन्तु स्वयं सतीनाथ भादुड़ी मैला आंचल को एक
मौलिक कृति स्वीकार करते हैं। यद्यपि शिल्प की दृष्टि से दोनों रचनाओं में काफी एकरूपता
है, लेकिन दोड़ाय
चरितमानस जहां एक व्यक्ति का निजी आख्यान है, वहीं मैला आंचल व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक सन्दर्भों
से जुड़ा हुआ है।
कुछ आलोचकों का मानना है कि आंचलिक उपन्यास में
नायक की उपस्थिति नहीं मिलती तो दूसरी ओर कुछ आलोचक अंचल को ही नायक का दर्जा देते
है। मैला आंचल में किसी भी पात्र को नायक का दर्जा नहीं दिया जा सकता। प्रशान्त, बालदेव, कालीचरण, लक्ष्मी कोठारिन
जैसे कई पात्र हैं जो महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन में कोई भी नायक की केन्द्रीय स्थिति
को प्राप्त नहीं करता। प्रशान्त की भूमिका काफी हद तक एक सूत्रधार की तथा रेणु के
आस्थावादी नजरिये के वाहक की है। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि मैला आंचल में
कथाकार ने किसी एक व्यक्ति के बजाय समूचे आंचल को नायकत्व प्रदान किया है। कई बार
तो अंचल नैरेटर की भूमिका भी अदा करता हुआ दिखता है।
रेणु ने उपन्यास में रेडियो, पत्र, समाचार पत्र जैसी
कई प्रविधियों का सर्जनात्मक उपयोग किया है। मैला आंचल कई बार उपन्यास के स्थान पर
उपन्यास, कविता, संस्मरण, पत्र, रिपोर्ताज जैसे
कई विधाओं का संश्लेष प्रतीत होता है। रेणु फोटोग्राफी के अच्छे जानकार थे। अपनी
फोटोग्राफी के ज्ञान का इस्तेमाल उन्होंने अपनी पूरे उपन्यास में किया है।
सम्पूर्ण मैला आंचल चित्रों की एक लम्बी श्रृंखला के रूप में हमारे सामने आता है।
ऐसे जैसे लेखक ने ग्रामीण परिवेश को पृष्ठभूमि बनाकर चित्रों का एक ‘कोलाज’ दर्शकों के सामने
रख दिया है।
सिनेमेटोग्राफिक तकनीक का
अन्यतम उपयोग मैला आंचल में मिलता है। लेखक का कैमरा दूर से और ऊंचाई से ‘लान्ग शॉट’ में पूरे गांव का
दृश्य दिखाता है, फिर धीरे-धीरे ‘जूम’ होता किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित हो जाता है। ‘क्लोज शॉट’ में आने के साथ
तस्वीर धीरे-धीरे ‘फेड’ हो जाती है और एक नयी तस्वीर पृष्ठभूमि से हुआ पूरे गांव का
भ्रमण कर लेता है।
पूरे उपन्यास में भाषा की
चित्रात्मकता और काव्यमयता देखते ही बनती है। कई स्थानों पर तो उपन्यास काव्य का
सा आनन्द देने लगता है- ‘‘बड़ी-बड़ी आंखों की मद भरी जोड़ी ने मुसकुरा के पूछा आप मेरी
शिकायत बर्दाश्त कर सकते हैं? ‘रोज तो कर रहा हूँ’ दो लापरवाह आंखों ने मानो चुटकी ली।’’
बिम्बों और प्रतीकों का
ऐसा सहज संयोजन अन्यत्र दुर्लभ है। घाण बिम्बों का प्रयोग-लक्ष्मी की बांह ठीक
बालदेव की नाक से सट गयी थी। लक्ष्मी के रोम रोम से पवित्र सुगंधि निकलती है।
चन्दन की तरह मनोहर शीतल गन्ध निकल रही है। बालदेव का मन इस सुगन्ध में हेल डूब कर
रहा है। ध्वनि बिम्बों का प्रयोग-संथालों के डिग्गा और मादल एक स्वर में बोल उठते
हैं रिंग-रिंग-रिंग डा डा डा आज रिंग रिंग रिंग ता धिन ता या डा डा डिगा नहीं
सिर्फ रिंग रिंग रिंग डा डा डा।
कमली और प्रशान्त तथा
खलासीजी और फुलिया की प्रेम कथा के बीच क्रमशः लोक गीतों तथा विद्यापति और सारंगा
सदाबृज का कहानी के समानान्तर प्रयोग भावों को अधिक मार्मिक और अर्थगर्भी बनाता
है- ‘‘अधरक मधु जब चाखन
कान्ह तोहर शपथ हम किछू नहीं जान्ह।’’
रेणु के यहाँ प्रेमचन्द
की इतिवृत्तात्मकता के दर्शन नहीं होते। घटनाओं का वर्णन करने की फेहरिश्ती शैली
के बजाय रेणु परस्पर विरोधी दृश्यों को सामने रखकर द्वन्द एवं तनाव का सृजन करते
हैं और इसके माध्यम से वास्तविक स्थितियों को सामने लाते हैं।
मैला आंचल की भाषा को
लेकर काफी बातें कही गयी हैं। भाषा में
आंचलिक तत्वों का प्रयोग कथा को एक विशिष्ट यथार्थवादी तेवर तो देता है
लेकिन दूसरी ओर आंचलिक शब्दों की अतिशयता यथार्थ पर एक पर्दा सा डालने लगती है।
ऐसे ही कुछ उदाहरणों को देखकर कई आलोचकों ने रेणु पर रूपवादी होने का आरोप लगाया
है। परन्तु, समग्रता में देखें तो कुछ अपवादों को छोड़कर मैला आंचल की भाषा न सिर्फ एक
विशिष्ट अंचल के यथार्थ को अभिव्यक्त करने में सक्षम है, बल्कि यह कथ्य को एक राष्ट्रीय स्वरूप भी
प्रदान करती है। अंचल की भाषा मैथिली होने के बावजूद कई पात्रों का भोजपुरी बोलना
थोड़ा अटपटा सा लगता है। अंग्रेजी भाषा का नाटकीय प्रयोग हास्य उत्पन्न तो करता है, परन्तु यथार्थ की
अभिव्यक्ति की दृष्टि से इसका महत्व संदिग्ध है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि
कुछ खामियों के बावजूद मैला आंचल की भाषा पूर्णतया यथार्थवादी है। क्लिष्ट आंचलिक
शब्दों के प्रयोग के कारण कहीं-कहीं संप्रेषणीयता की समस्या उत्पन्न होती है, लेकिन यह कहीं भी
उपन्यास के मूल यथार्थ को प्रस्तुत करने में विफल नहीं रही है।
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